राजगढ़ 20 अक्टूबर 2026 -  देशभर में जहां दशहरे पर रावण के पुतले का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व मनाया जाता है, वहीं मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के भाटखेड़ी गांव में इस दिन रावण का पुतला जलाने के बजाय उसकी पूजा की जाती है। यहां के ग्रामीण रावण और कुंभकर्ण को अपना इष्टदेव मानते हैं। यही वजह है कि दशहरे पर गांव में रावण दहन नहीं होता, बल्कि विधि विधान से पूजा अर्चना की जाती है और लोगों के बीच मिठाइयां बांटी जाती हैं।

भाटखेड़ी में रावण और कुंभकर्ण के प्रति ग्रामीणों की आस्था केवल दशहरे तक सीमित नहीं है। गांव के लोगों का मानना है कि जब भी गांव या किसी परिवार पर कोई विपत्ति आती है और दूसरे उपायों से समाधान नहीं निकलता, तब वे रावण और कुंभकर्ण की प्राचीन प्रतिमाओं के सामने पहुंचकर मन्नत मांगते हैं। ग्रामीणों का विश्वास है कि इन प्रतिमाओं के सामने श्रद्धा से सिर झुकाने पर उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और संकट के समय उन्हें संरक्षण मिलता है।

ग्रामीणों की इसी मान्यता के कारण यहां रावण को केवल बुराई के प्रतीक के रूप में नहीं देखा जाता। उनके लिए वह भगवान शिव का अनन्य भक्त और संकट के समय रक्षा करने वाला आराध्य है। ग्रामीणों का तर्क है कि जिस रावण से वे अपनी मनोकामनाएं पूरी होने की उम्मीद रखते हैं, उसका पुतला जलाकर वे भला दशहरा कैसे मना सकते हैं?।

भाटखेड़ी में दशहरे के दौरान परंपरा का एक अनूठा रूप देखने को मिलता है। गांव के राम मंदिर में नवरात्रि के नौ दिनों तक रामलीला का मंचन किया जाता है। रामलीला में रावण वध का प्रसंग पूरा होने के बाद ग्रामीण मंदिर से निकलकर रावण और कुंभकर्ण की प्रतिमाओं के पास पहुंचते हैं। वहां विधि विधान से पूजा अर्चना और आरती की जाती है। इसके बाद लोग एक - दूसरे को मिठाइयां बांटकर उत्सव मनाते हैं।

भाटखेड़ी की यह अनूठी परंपरा बताती है कि भारत में धार्मिक आस्थाओं और लोक मान्यताओं के विविध रूप देखने को मिलते हैं। यहां रावण को लेकर प्रचलित धारणा, उसकी पूजा और दशहरे का अलग अंदाज गांव को विशिष्ट पहचान देता है।