सक्ती - राजा सुरेन्द्र बहादुर ने अपने ही हाथों किया अपने राजनीतिक सफर का अंत?? , या फिर कांग्रेस ने,,
सक्ती , 09-12-2024 7:54:49 AM
सक्ती 09 दिसम्बर 2024 - 1998 के विधानसभा चुनाव से पहले सक्ती सहित अविभाजित मध्यप्रदेश में सक्ती राजा सुरेन्द्र बहादुर के नाम का डंका बजता था। बड़े बड़े नेता और राजनीतिज्ञ राजा साहब के सामने हाथ बांधे खड़े रहते थे। लेकिन 1998 में विधानसभा चुनाव हारने के बाद राजा की विधायकी चली गई। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि 1998 का चुनाव हारने के बाद राजा सुरेन्द्र बहादुर पर कांग्रेस ने दुबारा भरोसा क्यो नही जताया??।
इस सवाल का जवाब तलाशने की जहमत ना तो राजा ने उठाई और ना उनके करीबियों ने इस सवाल का जवाब जानने की कोशिश की। अगर समय रहते इस सवाल पर चिंतन कर लिया जाता तो आज राजमहल से राजनीति बाहर ना निकली होती।
साल 2008 के विधानसभा चुनाव में मनहरण राठौर के हराने के बाद कांग्रेस ने 2013 के चुनाव में मनहरण राठौर की पत्नी सरोजा राठौर को मैदान में उतारा था लेकिन साल 1998 में राजा के चुनाव हारने के बाद कांग्रेस ने राजा तो राजा राजमहल के किसी भी सदस्य पर आज तक भरोसा नही जताया और यही वजह है कि साल 2013 के विधानसभा चुनाव में राजा सुरेंद्र बहादुर ने कांग्रेस से बगावत कर गोंडवाना गणतंत्र पार्टी की टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ा था। हालांकि वो चुनाव हार गए थे।
मुद्दे की बात यह कि पार्टी चाहे कोई भी हो कद्दावर नेता के चुनाव हारने के बाद भी कम से कम एक बार जरूर उस पर भरोसा जताती है लेकिन राजा सुरेन्द्र बहादुर के साथ ऐसा नही हुआ 1998 में चुनाव हारने के बाद कांग्रेस ने राजा से ऐसा मुंह मोड़ा की कभी पलट कर भी नही देखा लेकिन चुनाव आते ही समर्थन के लिए राजमहल की डेहरी चूमने जरूर जाते है। और इससे साफ जाहिर होता है कि राजा सुरेन्द्र बहादुर आज भी किंगमेकर है।

















